Tuesday, 22 September 2015

फिजां इतनी बोझल क्यूं है..

फिजां इतनी बोझल क्यूं है.. ख़्वाब निगाहों से ओझल क्यूं है.. मौत से मिलने की तलबगार है.. ज़िन्दगी इतनी बेकल क्यूं है.. सही गलत की परख नही है.. ख़्वाहिशें इतनी चंचल क्यूं है.. चेहरे मासूमियत से भरे हैं.. दिलों मे इतना हलाहल क्यूं है.. सूकून भी सूकून नही देता.. बेचैनी से भरा हरपल क्यूं है.. अहंकार से लबालब है हर शख्स.. फिर हालात इतने निर्बल क्यूं है.. जब आखिरी अंजाम मिट्टी का मिट्टी है.. फिर हर इंसान पत्थर दिल क्यूं है

बीती शब ख्वाबगाह मे मेहबूब से मुलाकात हो गइ

बीती शब ख्वाबगाह मे मेहबूब से मुलाकात हो गइ दिल ही दिल मे दिल से दिल की हरेक बात हो गई अमावस्या के पखवाडे मे चांदनी रात हो गई सावन के सुहाने मौसम मे महबूब से मुलाकात हो गई

मोहब्बत की मिसाल हो तो ऐसी हो

मोहब्बत की मिसाल हो तो ऐसी हो कही ना कभी ना ,किसी ने सुनी हो बेवफ़ा , अगर दिल तोड़ भी जाये तो दिल से दुआ निकले , उसको कही ज़ख्म ना हो माना की वो मतलबी था मतलब निकाल गया पर हमे तो वो सच्ची मोहब्बत करना सीखा गया