मुक्तक 1 आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है बाग मे कालियो के खिलने से भवरो के दिल मचलते है 2 खुद की पराछियो से ही अब वो डरने लगे है अपने हाथ मे खंजर लिये पराछियो से ही लडने लगे है 3 वह ह्वाए जो पूरब ...
मुक्तक 1 आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है बाग मे कालियो के खिलने से भवरो के दिल मचलते है 2 खुद की पराछियो से ही अब वो डरने लगे है अपने हाथ मे खंजर लिये पराछियो से ही लडने लगे है 3 वह ह्वाए जो पूरब ...
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