Tuesday, 28 April 2015

मुक्तक 1 आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है बाग मे कालियो के खिलने से भवरो के दिल मचलते है 2 खुद की पराछियो से ही अब वो डरने लगे है अपने हाथ मे खंजर लिये पराछियो से ही लडने लगे है 3 वह ह्वाए जो पूरब ...

मुक्तक 1 आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है  बाग मे कालियो के खिलने से भवरो के दिल मचलते है   2 खुद की पराछियो से ही अब वो डरने लगे है  अपने हाथ मे खंजर लिये  पराछियो से ही लडने लगे है    3 वह ह्वाए जो पूरब ...

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